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क्यों खत्म होते जा रहे हैं सीढ़ीनुमा खूबसूरत खेत ?क्या पलायन है बड़ी वजह

उत्तराखंड|

यकीन करना मुश्किल है लेकिन सरकारी आंकड़े पर भरोसा करना ही होगा। हम बात कर रहे हैं राजस्व विभाग के उन आंकड़ों की जिसके अनुसार उत्तर प्रदेश से अलग होकर जब उत्तराखण्ड राज्य 9 नवम्बर 2000 को वजूद में आया उस वक़्त पहाड़ में 776191 हेक्टेयर कृषि भूमि थी.

राज्य बनने के साथ ही पहाड़ों से लेकर मैदान तक हरे भरे बागों में सीमेंट के जंगल खड़े होने लगे और बासमती के खुशबूदार चावल उगाने वाले खेतों में आलिशान कोठियां उगने लगी। नतीज़ा तो बुरा होना ही था लिहाज़ा अप्रैल 2011 में कृषि भूमि का दायरा घटकर 723164 हेक्टेयर रह गया ।

आप अनुमान लगाइये की नए नवेले पहाड़ी राज्य ने चंद सालों में ही अपनी खूबसूरत तस्वीर कितनी बदरंग कर दी थी। 53027 हेक्टेयर कृषि भूमी कम होने का सीधा मतलब है की किसानों की रोजीरोटी पर संकट बढ़ने लगा और पैदावार घटने लगी थी ।

जिसने भी उत्तर प्रदेश का हिस्सा रहे उत्तराखंड में अपनी छुट्टियां बितायी होंगी या मसूरी , नैनीताल , बागेश्वर , रानीखेत , अल्मोड़ा , उत्तरकाशी जैसे प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर स्थानों को देखा होगा आज की तस्वीर देख कर उन्हे अफ़सोस ही होगा। होटल ,रिसोर्ट ,और व्यावसायिक बिल्डिंगों ने लहलहाते खेतों को निगल लिया। हालात ये है की दो दशक पहले प्राकृतिक सुंदरता, तरोताज़ा हवाओं हरे भरे जंगल और पहाड़ी खेती के लिए मशहूर उत्तराखंड धीरे-धीरे अपनी पहचान खोने लगा है ।मेट्रो कल्चर और मोर्डर्न लाइफ स्टाइल के साथ अनजाने विकास की अंधी दौड़ ने लोगों की सोच और रहन सहन का तरीका बदल दिया है। इसका सीधा प्रभाव जहाँ पहाड़ के घरों में नज़र आ रहा है तो वही पहाड़ के दूर तक फैले क्षेत्र की संरचना में भी अब नज़र आ रहा है। अब यहां जंगलों और प्राकृतिक रूप से निर्मित मकानों की जगह कंक्रीट के घर ने ले ली है। बड़े बड़े रिसोर्ट और होटल बनाने और अधिक से अधिक पैसा कमाने की लालच ने लोगों को खेती किसानी से दूर कर दिया है। यही वजह है की पहाड़ में जल्दी पैसे बनाने की लालच ने किसानों की खेती के पुश्तैनी कारोबार को काफी हद तक कम कर दिया है ।

आपको याद होगा की इसी गंभीर मुद्दे को लेकर अगस्त 2018 में उत्तराखण्ड हाईकोर्ट ने प्रदेश में घट रही कृषि भूमि की ओर अपनी चिंता भी ज़ाहिर की थी इस मामले पर तात्कालीन कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजीव शर्मा और जस्टिस मनोज तिवारी की बेंच ने 226950 किसानों द्वारा पर्वतीय क्षेत्र से पलायन करने पर चिंता जताई थी। इस दौरान कोर्ट ने बीते वर्षों में प्रदेश के जनपदों में हुए पलायन का भी ज़िक्र किया था।अल्मोड़ा 36401, पौड़ी 35654, टिहरी 33689, पिथौरागढ़ 22936, देहरादून 20625, चमोली 18536, नैनीताल 15075, उत्तरकाशी 11710, चम्पावत 11281, रूद्रप्रयाग 10970, बागेश्वर 10073 किसानों द्वारा पलायन करने की बात में सामने आयी थी

पर्वतीय क्षेत्र के विकास और पहचान को बचाने के मकसद से जिस उत्तराखंड को हासिल करने में गढ़वाल और कुमायूं के अनगिनत नौजवानों महिलाओं ने क़ुरबानी दे दी और उस पहाड़ में कभी 90 फ़ीसदी लोगों की ज़िंदगी कृषि पर निर्भर हैं। लेकिन आज विकास की अंधी दौड़ में हांफता पहाड़ केवल 20 प्रतिशत कृषि भूमि बचा पाया है। हैरानी तो ये हैं कि इस 20 प्रतिशत कृषि भूमि में से भी केवल 12 प्रतिशत ही सिंचित है और 08 प्रतिशत वर्षा पर आधारित है। अब आपको थोड़ा अंदाज़ा तो लग ही गया होगा की पहाड़ से पलायन की मूल वजह है क्या ?
NewsCourtesy:http://missionmeragaon.org
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