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रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जिनकी कविताएं पढ़कर आज भी लोग जोश से भर जाते हैं

स्वतंत्रता के बाद, देश को वर्षों तक रही गुलामी की चोट को भरना था. तो वहीं समाज में व्याप्त कुरीतियों तथा सामंतवादी सोच से भी लड़ना था.

उसी कालखंड के एक वीर रस से भरे कवि थे ‘रामधारी सिंह दिनकर’ जिनकी कविताओं को पढ़कर आज भी लोगों के अंदर जोश भर जाता हैं.
आज रामधारी सिंह दिनकर का जन्म दिवस है जिन्होंने समाज, धर्म, राजनीति, प्रेम इत्यादि विषयों पर अनेकों कविताएं लिखी हैं. जो हिंदी साहित्य में मील की पत्थर है.

आजादी के बाद 1950 में उन्होंने सामंतवादी मानसिकता वाले लोगों को सिंहासन खाली करने के लिए एक रचना की. ये उनकी कालजयी रचना मानी जाती है.

“सदियों की ठंढी-बुझी राख सुगबुगा उठी,
मिट्टी सोने का ताज पहन इठलाती है;
दो राह,समय के रथ का घर्घर-नाद सुनो,
सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।”

नेहरू और दिनकर-

वैसे तो दिनकर आजादी के पहले से ही कांग्रेस से जुड़े हुए थे. परंतु राजनीति पर अपनी बात बिना लाग लपेट के कहते थे.
एक बार दिल्ली में लाल किले पर ‘कवि सम्मेलन’ था. जिसकी अध्यक्षता ‘दिनकर’ कर रहे थे. पंडित नेहरू (उस वक्त के प्रधानमंत्री) भी कवि सम्मेलन में आए थे. लाल किले की सीढ़ियों पर चढ़ते वक्त नेहरू का पैर फिसल गया और राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें संभाला. जब नेहरू ने दिनकर को धन्यवाद दिया, तो मुखर दिनकर ने तुरंत ही कहा “इसमें शुक्रिया की क्या बात है जब भी राजनीति लड़खड़ाती है तो उसे कविताओं ही संभालती है”.

वैशे ही एक बार संसद में रामधारी सिंह दिनकर 1962 में चीन से मिली हार के बाद पंडित नेहरू पर निशाना साधते हुए कहे थे.

“वे देश शान्ति के सबसे शत्रु प्रबल हैं,
जो बहुत बड़े होने पर भी दुर्बल हैं,
हैं जिनके उदर विशाल, बाँह छोटी हैं,
भोथरे दाँत, पर, जीभ बहुत मोटी है।”

दिनकर का प्रारंभिक जीवन-

रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 में बिहार के ‘मुंगेर’ जिला में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था. दिनकर की प्रारंभिक शिक्षा वहीं से हुई. दिनकर हिंदी, अंग्रेजी के साथ संस्कृत, उर्दू तथा बंगला के भी जानकर थे.

रामधारी सिंह दिनकर ‘पटना विश्वविद्यालय’ से इतिहास और राजनीति शास्त्र में B.A. करने के बाद एक विद्यालय में अध्यापक की नौकरी करने लगे.

दिनकर ने विभिन्न पदों पर काम किया-

• 1934 से 1947 तक यह सब रजिस्टार के रूप में कार्य किए.
• 1950 से 1952 तक उन्होंने प्रचार विभाग के उप निदेशक पद पर कार्य किया.
• दिनकर ने आजाद भारत के हिंदी सलाहकार के रूप में भी कार्य किया.
• ये 1952 में राज्यसभा के सदस्य चुने गए तथा लगातार तीन बार राज्यसभा सदस्य रहे.

दिनकर की प्रमुख रचनाएं-

दिनकर को ‘कर्ण’ से बहुत लगाव था और उन्होंने कर्ण के जीवन पर अपनी एक सर्वश्रेष्ठ कविता “रश्मिरथी” लिखी.

रश्मिरथी (1952)-

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

ऐसा नहीं है कि दिनकर के अंदर प्रेम का कवि नहीं था. वो वीर रस के साथ-साथ प्रेम पर भी कविताएं लिखते थे. उन्होंने स्वर्ग की अप्सरा ‘उर्वशी’ पर एक रचना की थी. जो मानव प्रेम तथा मिलन को दर्शाता है.

उर्वशी (1971)-

इन्द्र का आयुध पुरुष जो झेल सकता है,
सिंह से बांहें मिलाकर खेल सकता है,
फूल के आगे वही असहाय हो जाता,
शक्ति के रहते हुए निरुपाय हो जाता,
विद्ध हो जाता सहज बंकिम नयन के बाण से,
जीत लेती रूपसी नारी उसे मुस्कान से.

इसी कड़ी में उन्होंने अन्य प्रमुख रचना की जैसे “परशुराम की प्रतीक्षा” (1963), “कुरुक्षेत्र”(1946), “संस्कृति के चार अध्याय”(1956) इत्यादि

रामधारी सिंह दिनकर को दिया गया सम्मान-

1959 में उन्हें संस्कृति के चार अध्याय के लिए “साहित्य अकादमी पुरस्कार” तथा राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद के द्वारा “पदम विभूषण पुरस्कार” से सम्मानित किया गया.

रामधारी सिंह दिनकर को 1972 में उनकी कृति “उर्वशी” के लिए हिंदी का “ज्ञानपीठ पुरस्कार” दिया गया.

इसके बाद भी रामधारी सिंह दिनकर को कई छोटे-बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया गया तथा उनके मरणोपरांत भारत सरकार ने उनके नाम पर 1999 में एक डाक टिकट जारी किया.

~अभिषेक कुमार तिवारी