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सफेद दाग वाले अब न हो परेशान, लंबे शोध के बाद मिली कामयाबी

 

 

जोधपुर। डॉ. एसएन मेडीकल कॉलेज के चर्म एवं रति रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. दिलीप कच्छवाहा की करीब बीस बरसों की लाइलाज सफेद दाग के बारे में किये गये शोध को अब सफलता मिली और यह शोध मेडिकल साइंस के प्रतिष्ठित आनलाइन जनरल पब मेड पर जोधपुर तकनीक के नाम से ख्याति प्राप्त कर चुकी है और इस तकनीक को अब देश और विदेशो में इस रोग के इलाज के लिये प्राथमिकता से उपयोग में लिया जा रहा है। यह जानकारी गुरुवार को डॉ. एसएन. मेडिकल कालेज के प्राचार्य डॉ. एस.एस. राठौड़ ने संवाददाता सम्मेलन में दी।

सफेद रोग के इलाज के लिये करीब दो दर्शक से सर्जिकल शोध कर रहे डॉ. दिलीप कच्छवाहा ने बताया कि सफेद दाग नामक चर्म रोग के उपचार के लिये मथुरादास माथुर अस्पताल में इस स्वजात प्राकृतिक नॉन ट्रिप्सिनाइज्ड अधिचर्म कोशिकाओं का प्रत्यारोपण अत्यंत सरल विधि से किया जाता है। यह मिलेनसाइट स्थानान्तरण की एक सरल एवं नई प्रणाली है। मिलेनसाइट जो कि त्वचा को रंग देने की कोशिका है। इस तकनीक का सिद्धात चर्म अपघषर्म से लिया जाता है। इस तकनीक में डोनर साइट से छोटे चमड़ी के कणों को लेकर सफेद दाग वाले स्थान पर रिप्लेसमेंट किया जाता है।

उन्होने बताया कि करीब 20 साल पहले मुहांसों के खड्डों के इलाज के दौरान छोटे छोटे कण उनकी आंखों के पास आ रहे थे बस यह सोच आगे जाकर जोधपुर तकनीक का रूप लेने लगे और उन्होंने इनको एकत्र करके सफेद दाग की सर्जरी के रूप में काम में लेना शुरू किया। उन्होंने इस शोध को यूएसए की इंटरनेशनल पिमेंट सेल कांफ्रेस में वाशिंगटन में प्रदर्शित किया तो इस तकनीक को नए आविष्कार की श्रेणी में रखा गया था जो कि आने वाले 30-40 सालो में सब ट्रेकनिक को प्रतिस्थापित कर देगी।

डाक्टर दिलीप कच्छवाहा ने बताया कि इस तकनीक को विश्व कांंफ्रेस ऑफ डर्मेटोलॉजी , इंटरनेशनल कांग्रेस ऑफ डर्मेटोलोजी, डीएएसआईएल व और कई राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय कांफ्रेस में प्रदशित की गई।

सर्जरी संज्ञाहरण के तहत होती है

उन्होंने बताया कि यह सर्जरी स्थानीय संज्ञाहरण के तहत की जाती है। जिसमें डोरन स्थान जांघ के बाहरी हिस्से को चयनित किया जाता है। डोनर स्थान सामान्यता प्राप्तकरण स्थान का एक तिहाई होता है। इस तकनीक को बड़े शरीर पर बहुतायत सफेद दाग पर भी उपयोग में लिया जा सकता है। यह एक सरल प्रक्रिया है जिसमे जटिल उपकरणों की आवश्यकता नहीं होती तथा विशेष ट्रेनिग और लेबोरेटरी की भी जरूरत नहीं होती है। यह सस्ती प्रक्रिया है एवं इसमें ऊपर से निगरानी की भी जरूरत नहीं होती है।

इसमें अतिरिक्त चिकित्सकीय कौशल की भी जरूरत नहीं होती है। इसमें बाहर की तरफ रिंग अथवा काब्ल स्टेनिंग की भी जरूरत नहीं होती है। यह चेहरे के लिये ज्यादा उपयुक्त विधि मानी जाती है और मिलिया का निर्माण भी नहीं होता है। उन्होंने यह बताया कि इस तकनीक को अल्सर के इलाज में भी प्रायोगिक तौर पर काम में लिया उसमें भी मरीजों को अल्सर के इलाज में सफलता मिली।

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