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‘सांवा’ शरीर के लिए एंटीबायोटिक, ऊसर जमीन में भी देती है भरपूर ऊपज

 

लखनऊ। ‘सांवा खाइके अखाड़े पर चढ़ले पहलवान, कोई ना तोड़ी पाई उनके सम्मान।’ यह पुरानी कहावत तो दूर सांवा आज देखने के लिए मिलना मुश्किल हो गया है। शरीर को निरोग रखने, हड्डियों को मजबूती देने वाले कैल्शियम और फास्फोरस की भरपुर मात्रा वाले ‘सांवा’ ने आधुनिक सोच के कारण दम तोड़ दिया है। जब विलुप्ति की कगार पर पहुंच गया तो कुछ लोगों का अब इसकी याद आने लगी। हालांकि अब सांवा की खेती फायदेमंद है और इसकी खेती से स्वास्थ्य के साथ ही कम पानी में किसान इससे अच्छी कमाई कर सकते हैं।

चावल से ज्यादा पौष्टिक

पुराने लोग जो ‘सांवा’ की खीर खाये होंगे, वही बता सकते हैं कि इसका नाम आते ही मुंह में पानी आ जाता था। उत्तर भारत में असिंचित क्षेत्रों में बोये जाने वाले सांवा के पौष्टिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रत्येग सौ ग्राम चावल में जहां प्रोटीन 6.8 ग्राम होता है, वहीं सांवा में 11.6 ग्राम पाया जाता है। इसी तरह कार्बोहाइड्रेट चावल में 78.2, सांवा में 74.3, वसा चावल में .5 और सांवा में 5.8, लौह तत्व .6 ग्राम सांवा में 4.7 ग्राम, कैल्शियम चावल में 10 मिली ग्राम सांवा में 14 मिली ग्राम, फास्फोरस चावल में 60 मिली ग्राम, सांवा में 121 मिली ग्राम पाया जाता है।

पानी की आवश्यकता ‘न’ के बराबर

इस संबंध में कानपुर कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिक डाक्टर मुनीष कुमार ने बताया कि इसके उत्पादन से जहां एक तरफ पानी की बचत होगी, वहीं यह शरीर के लिए एंटीबायटिक भी है। इन मोटे अनाजों को खाकर लोग पहले हृष्टपुष्ट रहा करते थे। जुलाई अगस्त माह में की जाने इस खेती के लिए सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। इसको कहीं भी कम उपजाऊ भूमि में भी उगाया जा सकता है। बलुई व दोमट मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त है।

छिटकावा विधि से होती है खेती

मानसून के प्रारम्भ होने से पूर्व खेत की जुताई आवश्यक है, जिससे खेत में नमी की मात्रा संरक्षित हो सके। अधिक पैदावार के लिए हल से दो–तीन जुताईयां उपयुक्त होता है। डॉक्टर मुनीष कुमार ने बताया कि इसके बुवाई छिटकाव विधि से या कूड़ों में 3-4 सेमी. की गहराई में की जाती है। कुछ क्षेत्रों में इसकी रोपाई करते हैं। परन्तु पंक्ति से पंक्ति की दूरी 25 सेमी. रखते हैं। लाइन में बुवाई लाभप्रद होती है। पानी के लगाव वाले स्थान पर मानसून के प्रारम्भ होते ही छिटकवाँ विधि से बुवाई कर देना चाहिए।

टी-46 अधिक प्रचलित बीज

डाक्टर मुनीष कुमार ने बताया कि प्रति हेक्टेयर 8 से 10 किग्रा. गुणवत्तायुक्त बीज पर्याप्त होता है। इसकी प्रमुख प्रजातियां टी-46, (उत्तर प्रदेश में प्रमुख रूप से प्रचलित), टी-46, आईपी-149 और कम दिन में पकने वाला आईपीएम-100 है। इसकी फसल 60 से 85 दिन के भीतर पक कर तैयार हो जाती है। इसकी खेती के लिए 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से कम्पोस्ट खाद खेत में मानसून के बाद पहली जुताई के समय मिलाना लाभकारी होता है।

समय से करें निराई

डाक्टर मुनीष कुमार के अनुसार, बुवाई के 30 से 35 दिन तक खेत खरपतवार रहित होना चाहिए। निराई-गुड़ाई द्वारा खरपतवार नियंत्रण के साथ ही पौधों की जड़ों में आक्सीजन का संचार होता है जिससे वह दूर तक फैलकर भोज्य पदार्थ एकत्र कर पौधों की देती हैं। सामान्यतया दो निराई-गुड़ाई 15-15 दिवस के अन्तराल पर पर्याप्त है।

बीमारियों से बचाव के लिए करें दवा का छिड़काव

इसमें प्रमुख रूप से तुलासिता (कवक जनित रोग), कंडुवा, रतुआ रोग लगते हैं। इसके लिए रोग की रोकथाम के लिए मैंकोजब, थिरम, जिनेब का छिड़काव किया जाता है।

उपज

सांवा की उपज 15 क्वींटल प्रति हेक्टेयर हो जाती है। सांवा को बाजार में बिक्री की भी कोई परेशानी नहीं है। आज तो स्थिति यह है कि इसे लोग हाथों-हाथ खरीद लेंगे।

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