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उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को अरबों का नुकसान, जानें वजह

उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों को अरबों का नुकसान, जानें वजह
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गन्ना उत्पादन में 15 से 25 फीसदी की कमी

गोरखपुर। उत्‍तर प्रदेश के तकरीबन 42 जिलों के गन्ना किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कम बरसात से सूखे की स्थिति तो पूर्वांचल में अधिक बारिश की वजह से यह स्थिति उत्पन्न हुई है। गन्ने के उत्पादन में 15 से 25 फीसदी की कमी आ रही है।

पूर्वांचल में उत्पादन कम होने से बस्ती, गोरखपुर मंडलों के सभी सातों जिलों के गन्ना किसानों को तकरीबन साढ़े तीन अरब से अधिक की चपत लगी है। गन्ने के कैंसर यानी रेडरॉट भी इसकी बड़ी वजह बताई जा रही है। दोनों मंडलों के 50 हजार से अधिक प्रभावित किसानों के खेतों में खड़ी 105 लाख कुंतल गन्ना सूखने का अनुमान लगाया जा रहा है। इसका मुख्य कारण छह महीने तक खेतों में पानी जमा होना बताया जा रहा है। कुशीनगर, देवरिया, महराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती व संत कबीरनगर जिलों में लगातार हुई बारिश का खामियाजा करीब किसानों का भुगतना पड़ रहा है। क्षमता से अधिक छह महीनों तक हुई बारिश से 13 हजार 703 हेक्टेयर गन्ना सूख गया है।

गन्ना की क्षमता से अधिक हुई बरसात

बुआई से लेकर कटाई तक गन्ने की फसल में कुल 900 से 1000 एमएम पानी की जरूरत होती है। लेकिन मार्च महीने से लेकर अगस्त तक दोनों मंडलों के अलग अलग क्षेत्रों में 12 सौ लेकर 16 सौ एमएम तक बरसात हुई है। 06 माह तक गन्ने की फसल में बरसात का पानी जमा रहा। इस वजह से गन्ने की फसलें सूख गईं। कहीं-कहीं रेडरॉट की वजह से भी गन्ने सूखे हैं।

इतना गन्ना सूखा

कुशीनगर में 9330 हेक्टेयर, देवरिया में 942 हेक्टेयर, महाराजगंज में 1151 हेक्टेयर, बस्ती व संतकबीरनगर में 1800 हेक्टेयर तथा सिद्धार्थनगर में 80.50 हेक्टेयर गन्ना सूखा है।


उत्पादन में आया अंतर

मुजफ्फरनगर में वर्ष 2019-20 में 75-80 कुंतल का उत्पादन मिला था। लेकिन अब यह घटकर 48-56 कुंतल तक सिमट गया है। इसी तरह से बागपत में 70-80 का उत्पादन इस वर्ष 60-70 कुंतल प्रति बीघा मिल रहा है। बिजनौर में 65-69 कुंतल मिलक्क़ उत्पादन भी अब 55-59 कुंतल प्रति बीघा मिलने से किसान परेशान हैं। शामली का पिछले वर्ष का उत्पादन (65-70) 55-60 कुंतल प्रति बीघा और मेरठ का वर्ष 2019 में मिला 74-75 कुंतल प्रति बीघा का उत्पादन 70-71 तक सिमट गया है।

पैदावार कम होने की वजह

-पेराई सत्र 2019-2020 जून माह तक चला, कम समय मिलने से गन्ने की बढ़वार प्रभावित हुई।

-शुरुआत में ज्यादा बारिश और बाद में कम बारिश होने का भी असर गन्ने की फसल पर पड़ा।

-रोग और कीटों का प्रकोप, लाल सड़न रोग और पोक्का बोइंग ने भी फसल को पहुंचाया नुकसान।


जिला गन्ना अधिकारी वेद प्रकाश सिंह का कहना है कि कुशीनगर में ढाई लाख किसानों ने 91 हजार हेक्टेयर में गन्ने की बुआई की है। गन्ना विभाग समेत पांच चीनी मिलों के तीन सौ कर्मचारियों की टीम से सितंबर महीने में सर्वे कराया गया था। इसमें रेडरॉट, उकठा रोग व जलप्लावन से 9330 हेक्टेयर गन्ना सूख गया है। रिपोर्ट शासन को भेज दी गई है।

इधर, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत, शामली, बिजनौर, मुजफ्फर नगर और सहारनपुर जिलों के किसानों के मुताबिक प्रति बीघा करीब दस से 15 क्विंटल गन्ना कम निकल रहा है। मेरठ में चार से पांच क्विंटल की कमी बताई जा रही है। गन्ना विभाग भी बिजनौर, शामली, मुजफ्फरनगर और बागपत में गन्ना पैदावार में करीब 15 फीसदी और सहारनपुर में 20 फीसदी तक की गिरावट होने की बात मान रहा है। इन जिलों में किसानों को पिछले साल के रेट पर ही करीब तीन हजार रुपये से अधिक प्रति बीघा का नुकसान हो रहा है। लागत वृद्धि से हुआ नुकसान अलग है। मेरठ में यह नुकसान करीब 1500 रुपये प्रति बीघा का है।

गन्ना शोध संस्थान मुजफ्फरनगर के निदेशक वीरेश कुमार का कहना है कि गन्ने की पैदावार में अभी करीब 15 प्रतिशत की कमी है। पूरे सत्र में पिछले साल के मुकाबले 10 प्रतिशत पैदावार कम होने का अनुमान है। किसानों ने देर से पेड़ी की फसल को काटा और अब उसी की कटाई कर रहे हैं। फसल को ग्रोथ के लिए कम समय मिला है। इस साल बरसात भी कम हुई है, जिसका असर फसल पर पड़ा है।

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