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फैसला : सेंट्रल विस्टा राष्ट्रीय महत्व से जुड़ा प्रोजेक्ट, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया 1 लाख का जुर्माना

फैसला : सेंट्रल विस्टा राष्ट्रीय महत्व से जुड़ा प्रोजेक्ट, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया 1 लाख का जुर्माना
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नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस डीएन पटेल की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिकाकर्ता पर एक लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। पिछले 17 मई को कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रोजेक्ट राष्ट्रीय महत्व से जुड़ा हुआ प्रोजेक्ट है। इसे अलग रखकर नहीं देखा जा सकता है। कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर निर्माण कार्य को रोके जाने का निर्देश देने से इनकार करते हुए कहा कि अगर मजदूर निर्माण स्थल पर ही रह रहे हैं तो उसपर रोक का कोई सवाल नहीं उठता है।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील सिद्दार्थ लूथरा ने कहा था कि वर्तमान संकट के माहौल में निर्माण में लगे मजदूरों का स्वास्थ्य खतरे में है। उन्होंने कहा था कि 4 मई को जब याचिका दायर की गई थी उस समय दिल्ली में स्थिति काफी भयानक थी। उन्होंने कहा था कि ये अच्छी बात नहीं है कि लोगों की तकलीफों के लिए संवैधानिक कोर्ट में याचिका दायर करना पड़े। उन्होंने कहा था कि स्वास्थ्य का अधिकार मौलिक अधिकार है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को उद्धृत करते हुए कहा था कि मानव जीवन की रक्षा संविधान की धारा 21 के तहत सरकार का दायित्व है।

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा था कि शापूरजी पलोनजी ने सेंट्रल विस्टा के लिए काम कर रहे मजदूरों, निरीक्षण स्टाफ और मैटेरियल के परिवहन की अनुमति मांगी। तब लूथरा ने कहा कि केंद्र के हलफनामे में अनुमति देने संबंधी कोई दस्तावेज का जिक्र नहीं किया गया है। लूथरा ने केंद्र सरकार की उस दलील को गलत बताया जिसमें कहा गया था कि निर्माण स्थल पर मजदूरों के लिए चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हैं और वहां कोरोना प्रोटोकॉल का पालन किया जा रहा है। उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार ने झूठा हलफनामा दाखिल किया है।

सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा था कि ये बहस का विषय नहीं है कि जीवन का अधिकार संविधान की धारा 21 का हिस्सा है। उन्होंने कहा था कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को कई चुनौतियां हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मिलीं। कई दिनों तक चली सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी । इसका निर्माण काफी दिनों से चल रहा है। उन्होंने अप्रैल महीने का एक नोटिफिकेशन दिखाया था जिसमें निर्माण कार्य पर कोई रोक की बात नहीं कही गई थी। उसके बाद रेस्टोरेंट और दूसरे कामों की अनुमति दी गई।

सेंट्रल विस्टा का निर्माण कर रहे शापूरजी पलोनजी की ओर से वरिष्ठ वकील मनिंदर सिंह ने कहा था कि ये याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पता है। लेकिन उसके बावजूद ये याचिका दायर कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि ये याचिका अखबारों की खबरों के आधार पर हैं। उन्होंने कहा था कि जिन दस्तावेजों के आधार पर याचिका दायर की गई है वो दाखिल ही नहीं की गई है। याचिकाकर्ता यह कहकर सनसनी पैदा करना चाहते हैं कि सेंट्रल विस्टा कोरोना हब है और लोग मर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि आधे राजपथ की खुदाई हो चुकी है। अगर उसमें पानी भरने दिया गया तो उसके आसपास के इलाके इसमें आ गिरेंगे। अगर हम गणतंत्र दिवस मनाना चाहते हैं तो हम इसमें देरी नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा था कि इस निर्माण के लिए कोरोना से संबंधित सभी औपचारिकताएं पूरी कर ली गई हैं।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले 5 जनवरी को सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी थी। तीन जजों की बेंच ने 2-1 के बहुमत से फैसला सुनाते हुए सेंट्रल विस्टा के लिए जमीन का डीडीए की तरफ से लैंड यूज बदलने को सही करार दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण क्लियरेंस मिलने की प्रक्रिया को सही कहा था।

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