Breaking News
Donate Now

लॉकडाउन में बच्चों की मानसिक समस्याएं

Covid-19 के बढ़ते प्रसार ने वैश्विक आबादी को घरों में रहने को मजबूर कर दिया है। भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में स्वास्थ्य एवं आवश्यक सेवाओं के अतिरिक्त शेष मानवीय गतिविधियों को या तो पूर्ण रूप से या आंशिक रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया है। लॉकडाउन का एकमात्र उद्देश्य मानव जीवन की रक्षा करना है। एक ओर जहां लॉकडाउन कोविद-19 को रोकने में कारगर माना जा रहा है वहीं दूसरी ओर, वैश्विक संकट के इस दौर में, बच्चों को कई तरह की मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है जो उनके दिल-दिमाग को विकारग्रस्त कर रहा है।

हो रहे है अकेलेपन के शिकार 

बच्चे घरों में अकेलेपन का शिकार हो रहे हैं। जिस प्रकार सामान्य दिनों में महिलाएं एवं पुरुष काम पर ऑफिस जाते थे, बच्चों का स्कूल जाना भी सामान्य जीवन का अहम हिस्सा था लेकिन इस महामारी के कारण यह सब अब पहले जैसा नहीं रहा। दुनिया के बहुत सारे देश इस लाईलाज बीमारी के खौफ से लॉकडाउन का पालन कर रहे हैं। इससे बच्चों में लगातार चिड़चिड़ापन, बात-बात पर नाराजगी, चिल्लाने, अपने सामान को फेंकने, बात-बात पर जिद्द करने जैसी समस्याएं दिनों-दिन बढ़ती जा रही हैं। बाल रोग विशेषज्ञों एवं मनोचिकित्सकों के पास इस प्रकार की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं। बच्चों के स्कूल, गली-मोहल्लों की शरारतें बंद हैं; पार्क, मॉल की अठखेलियां रुकी पड़ी हैं जिससे उनके मनोरंजन के साधनों पर रोक-सी लग गई है।

सबसे ज्यादा है भारत में 

एक अनुमान के मुताबिक, 47 करोड़ से ज्यादा बच्चे भारत में रहते हैं अर्थात विश्व के 19 फीसदी बच्चे अकेले अपने देश में निवास करते हैं। दुनिया में नए साल की खुशियों के साथ महामारी ने दस्तक दे दी थी। तीन (भारत में दो) महीने से भी ज्यादा का समय गुजर चुका है और स्कूल, पार्क आदि बंद हैं; बच्चे घरों में कैद हैं। यूनिसेफ ने कहा है कि इससे ‘बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।’ ऐसे में, हमें बच्चों की मनःस्थिति को समझने की विशेष आवश्यकता है।

कोरोना वायरस की वजह से दुनिया भर के लोग अपने भविष्य को लेकर तनाव में हैं। यूनाइटेड नेशन्स इंटरनेशनल चिल्ड्रेन्स इमर्जेन्सी फंड (यूनिसेफ) के अनुसार, लगभग 1.5 बिलियन बच्चों और युवा किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर लॉकडाउन का बुरा प्रभाव पड़ रहा है। तकरीबन 188 देशों में लॉकडाउन ने खासा असर छोड़ा है। वैश्विक स्तर पर पढ़ने वाले बच्चों (ग्लोबल स्टुडेंट्स) में से लगभग 90 प्रतिशत बच्चे घरों में बंद हैं, जिन पर दबाव और तनाव लगातार बढ़ रहा है। इस कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा एवं मानसिक तनाव गहराता जा रहा है। उनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।

अपने देश भारत की बात करें तो एक रिपोर्ट के अनुसार, चाइल्डलाइन इंडिया के पास 9 से 15 वर्ष के बच्चों की ऐसी कॉल लगातार आई हैं जिनमें बच्चे चिड़चिड़ेपन, आक्रामकता और अपने परिवार से परेशान हैं। बच्चे बार-बार अपने माता-पिता के आपसी झगड़े और रोक-टोक से परेशान हो गए हैं। एक परिवार में तो नौबत यहां तक आ गई कि एक किशोर को बालगृह में रखना पड़ा। गैर सरकारी संगठन चाइल्डलाइन इंडिया के अनुसार, लॉकडाउन के सिर्फ शुरुआती 11 दिनों के बीच घरेलू हिंसा की 92,000 से अधिक कॉल आई। कई बच्चों की शिकायत थी कि वो अपने माता-पिता के साथ ही नहीं रहना चाहते, वे उनके जीवन में बहुत रोक-टोक करते हैं। सुरक्षा और सेहत का तकाज़ा सभी को घरों में रहने का है। पारिवारिक लिहाज़ से अपनों के साथ समय बिताने का यह बेहतर समय है, लेकिन बच्चों के लिए यह अवसाद जैसी कई मानसिक समस्याओं की पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है।

न करे ज्यादा रोकटोक 

मनोवैज्ञानिकों की मानें तो ज्यादा टोका-टाकी बच्चों को चिड़चिड़ा बना रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि अभिभावकों को स्वयं बदलना पड़ेगा। बच्चों की मनःस्थिति को समझना होगा। ज्यादा चिड़चिड़ापन जीवन के खतरनाक संकेत भी हो सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, 15 से 19 वर्ष की आयु के बच्चों में मौत का तीसरा प्रमुख कारण आत्महत्या है। 18 वर्ष से कम आयु के बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पिछले 30 वर्षों से लगातार बढ़ रही हैं। मानसिक स्वास्थ्य संबंधी इन समस्याओं का यदि सही समय पर उपचार किया जाए तो ये बहुत हद तक कम की जा सकती हैं और जीवन को आसान तथा बेहतर बनाया जा सकता है।

बच्चे कोमल फूल की भांति होते हैं अतः जल्दी मुरझा जाते हैं, उदास हो जाते हैं। स्वयं को चोट पहुंचाने की कोशिश भी करते हैं। कई बार छोटी-मोटी आम समस्याएं भी विकराल रूप धारण कर लेती हैं। बच्चों के मन में कुछ घटनाएं भावनात्मक रूप से घर कर जाती हैं जो जीवन में आगे बढ़ने में अड़चन पैदा करती हैं। मेंटल हेल्थ चैरिटी यंग माइंड्स की ओर से 2111 लोगों पर एक सर्वेक्षण किया गया। इसमें शामिल लोगों की आयु 25 वर्ष से कम थी। सर्वेक्षण के अनुसार, 83 प्रतिशत लोगों ने यह स्वीकार किया कि उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है जबकि 26 प्रतिशत लोगों का  कहना था कि मानसिक समस्या के लिए उन्हें किसी प्रकार का कोई उपचार या सहायता नहीं दी गई।

अपने साथ रखे बिजी 

आज के बच्चे कल के भविष्य हैं। देश की प्रगति, सुरक्षा एवं संरक्षण का दायित्व भविष्य में उनके कंधों पर होगा। अतः यह विचार करना बेहद जरूरी है कि देश के भविष्य इन नौनिहालों का संकट की इस घड़ी में ध्यान कैसे रखा जाय ताकि वे शारीरिक, मानसिक व सांवेगिक रूप से संतुलित बने रहें। बच्चों के कोमल हृदय व संवेदनशील दिमाग के लिए कोरोना वायरस, लॉकडाउन और क्वारंटाइन जैसे भारी-भरकम शब्द भी कुछ नए तरह की मुश्किलें पैदा कर रहे हैं। ऐसे में, उनके मानसिक स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखना बहुत जरूरी है।

एक प्रसिद्ध पत्रिका के अनुसार, ‘लॉकडाउन के समय दिन की शुरूआत पहले की तरह ही रखना आवश्यक है। बच्चों का जगना, नहाना, नाश्ता आदि तय समय पर ही होना चाहिए ताकि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उनकी सेहत पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े। बच्चों में नए ज्ञान की जिज्ञासा सदैव रहती है। यदि कोरोना से जुड़े सवाल बच्चे करते हैं तो उनका सकारात्मक जवाब देना चाहिए। कुछ समय बच्चों के साथ कार्टून, मूवी देखते हुए भी बिताएं जिससे बच्चे अकेला न महसूस करें। बच्चों की दिनचर्या या टाइम-टेबल उनकी सहमति से बनाएं और पालन करें।’ इस दौरान स्कूल बंद हैं लेकिन सरकार और स्कूलों के माध्यम से ऑनलाइन पढ़ाई के कई विकल्प उपलब्ध कराए गए हैं। ई-पाठशाला, स्वयंप्रभा, निष्ठा, दीक्षा ऐप्प आदि के माध्यम से निःशुल्क परीक्षा सामाग्री घर पर ही उपलब्ध कराई जा सकती है।

बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ट्विटर हैंडल पर यूनिसेफ के ‘ग्लोबल चीफ ऑफ एजुकेशन’ राबर्ट जेन्किन्स ने बच्चों की मनःस्थिति को बेहतर ढंग से समझने में मदद करने वाले पांच टिप्स बताए हैं –

  1. बच्चों के साथ मिलकर रूटीन बनाएं।
  2. अपना भी समय दें।
  3. बच्चों के साथ खुलकर बातचीत करें।
  4. आनॅलाइन प्लेटफार्म पर बच्चों की सुरक्षा।
  5. अपने बच्चों के स्कूल के संपर्क में रहें।

कोरोना संकट और लॉकडाउन की स्थिति बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक है। यदि बच्चों की मनःस्थिति को गंभीरता से न लिया गया तो समस्या और बढ़ेगी। बच्चों के तनाव को उनसे ज्यादा समय बात करके, उनकी बातें सुनकर, उनको नया वातावरण देकर काफी हद तक कम किया जा सकता है और उनके साथ अपने रिश्तों को और मजबूत किया जा सकता है। बच्चों की मनःस्थिति शांत व प्रसन्नचित रहेगी तो उनका मानसिक स्वास्थ्य उत्तम रहेगा और बेहतर मानसिक विकास भी हो पाएगा।

error: Content is protected !!