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12 जुलाई को देवशयनी एकादशी से लगेगा चातुर्मास, चार महीने नहीं होंगे मांगलिक कार्य

 

 

लखनऊ। देवशयनी एकादशी के अवसर पर 12 जुलाई से चातुर्मास प्रारम्भ हो रहा है। इसी दिन बृहस्पति भी अस्त हो जाएंगे। इसलिए चार महीने तक अब मांगलिक कार्य नहीं होंगे। चातुर्मास के दौरान संन्यासी एक स्थान पर प्रवास करते हुए साधना करेंगे।

ज्योतिर्विद डॉ. वासुदेव आचार्य के अनुसार चातुर्मास प्रतिवर्ष आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी के बीच पड़ता है। इस वर्ष यह 12 जुलाई से आठ नवंबर तक है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी कहा जाता है। कहीं-कहीं इस तिथि को ‘पद्मनाभा’ भी कहते हैं। सूर्य के कर्क राशि में आने पर यह एकादशी आती है। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है।
अधिकतर श्रद्धालु चातुर्मास व्रत को आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शुरू करते हैं, जबकि कुछ द्वादसी या पूर्णिमा से अथवा उस दिन से प्रारम्भ करते हैं जब सूर्य कर्क राशि में प्रविष्ट होता है। यह चाहे जब प्रारम्भ हो लेकिन इसका समापन कार्तिक शुक्ल एकादशी को ही होता है। संन्यासी सामान्यतः गुरु पूर्णिमा से चातुर्मास का आरम्भ मानते हैं। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 16 जुलाई को है।

डॉ. वासुदेव आचार्य का कहना है कि पुराणों के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान श्री हरि विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और फिर लगभग चार माह बाद तुला राशि में सूर्य के जाने पर वह उठते हैं। उस दिन को देवोत्थानी एकादशी कहा जाता है। बीच का अंतराल ही चातुर्मास है। इस काल में यज्ञोपवीत संस्कार, विवाह, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गृहप्रवेश, गोदान, प्राण प्रतिष्ठा जैसे शुभ कार्य नहीं सम्पन्न किये जाते हैं। भविष्य पुराण, पद्म पुराण तथा श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार हरिशयन को योगनिद्रा कहा गया है।

चार माह सत्ता शिव के पासः ज्योतिर्विद डॉ. वासुदेव का कहना है कि हिंदी कैलेंडर के चार माह- सावन, भादों, अश्विन (क्वार) और कार्तिक बड़े ही महत्वपूर्ण हैं। यह परिवर्तन का कालखंड है। इस अवधि में न केवल प्रकृति में परिवर्तन होता है बल्कि सूर्य-चन्द्रमा के तेज में भी बदलाव नजर आता है। सर्वाधिक ध्यान योग्य यह है कि इस कालावधि में सत्ता का भी हस्तान्तरण हो जाता है। भगवान श्री हरि विष्णु जब इन चार महीनों के लिए योगनिद्रा में चले जाते हैं तो त्रैलोक का पूरा प्रभार भगवान शिव के पास आ जाता है। वह ही पालनकर्ता भगवान विष्णु का भी काम देखते हैं। यही कारण है सावन में भगवान शिव की विशेष पूजा होती है। चार माह का यह कालखंड ‘चातुर्मास’ कहलाता है। चातुर्मास में व्रती को रात्रि को तारों के दर्शन के बाद एक समय भोजन करना चाहिए। धर्म शास्त्रों के अनुसार चतुर्मास में गुड़ का सेवन का बंद कर देना चाहिए। धर्म शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस दौरान फर्श पर ही शयन करना चाहिए।

श्रावण मास 17 जुलाई से

डॉ. वासुदेव आचार्य बताते हैं कि 17 जुलाई से इस बार श्रावण मास प्रारम्भ हो रहा है। यह महीना भगवान शंकर को अत्यधिक प्रिय है। चूंकि इस बार श्रावण से एक दिन पहले यानी पूर्णिमा को चंद्र ग्रहण का योग है। इसलिए श्रावण मास में किया गया पूजन अर्चन और अभिषेक अनंत पुण्य देने वाला होगा। श्रावण मास में इस बार चार सोमवार पड़ रहे हैं, जो 22 व 29 जुलाई तथा चार और 11 अगस्त को है। आचार्य ने बताया कि श्रावण माह में रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है। चातुर्मास और श्रावण महीने को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। प्रदेश भर के शिववालयों को सजाया जा रहा है। प्रमुख संत और संन्यासी चातुर्मास की तैयारियों को अंतिम रूप देने में लगे हैं। अधिकतर संन्यासी वाराणसी, मथुरा और प्रयागराज में इस वर्ष चातुर्मास का अनुष्ठान करेंगे।

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