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सीएए पोस्टर केस : हाई कोर्ट के आदेश पर रोक नहीं, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच करेगी सुनवाई

 

 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध में हिंसा के आरोपितों के वसूली वाले पोस्टर हटाने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई के लिए बड़ी बेंच को रेफर किया है। इस मामले पर अगले हफ्ते सुनवाई होगी।

सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि प्रशासन ने होर्डिंग्स लगाने के पहले 95 लोगों का पक्ष सुना था। उसके बाद हिंसा के जिम्मेदार 57 लोगों के पोस्टर लगाये गए थे। इस पोस्टर में कई समुदायों के लोग शामिल हैं।

तुषार मेहता ने कहा कि सारा मामला निजता के अधिकार के इर्द-गिर्द घूम रहा है। मेहता ने कहा कि पुट्टास्वामी जजमेंट में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति एक बार पब्लिक डोमेन में आ जाता है तो उसका निजता का अधिकार खत्म हो जाता है। तब जस्टिस अनिरुद्ध बोस ने कहा कि होर्डिंग लगाने का अधिकार आपको कहां से मिलता है। जस्टिस यूयू ललित ने कहा कि भले ही किसी का व्यवहार विधिसम्मत नहीं हो उसके बावजूद आपको होर्डिंग लगाने का अधिकार किसने दिया।

तुषार मेहता ने पुट्टास्वामी और आटो शंकर केस का हवाला देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति विरोध प्रदर्शन के दौरान बंदूक लहराता है तो वह निजता के अधिकार का दावा नहीं कर सकता है। प्रशासन का फैसला कानून सम्मत है। कोर्ट ने पूछा कि नुकसान की भरपाई की समय-सीमा खत्म हो गई है क्या? तब मेहता ने कहा कि उन्हें 13 फरवरी के बाद से एक महीना के अंदर भुगतान करना है।

कोर्ट ने कहा कि भुगतान के लिए अभी आरोपितों के पास समय बाकी है और रिकवरी के आदेश को चुनौती भी दी गई है जो लंबित है। कोर्ट ने पूछा कि क्या ऐसे गंभीर कदम की अनुमति कानून देता है। तब मेहता ने कहा कि निजता के अधिकार के भी कुछ प्रतिबंध हैं। तब कोर्ट ने कहा कि इस पर फैसले दिए जा चुके हैं। इसलिए हम इसे तीन जजों की बेंच के पास सुनवाई के लिए भेज रहे हैं।

एक आरोपी की ओर से वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि राज्य सरकार को ये बताना चाहिए कि होर्डिंग लगाने के लिए किस कानून का इस्तेमाल किया गया। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों की मंशा शर्म (shame) की होगी तो कुछ की घेरकर मारने (lynch) की। हम इसमें अंतर और नियंत्रण कैसे करेंगे।

सिंघवी ने कहा कि उनके मुवक्किल को 30 दिसंबर को कारण बताओ नोटिस मिलता है। दस दिनों के अंदर वे जवाब देते हैं। उन्होंने कहा कि प्रशासन का होर्डिंग लगाने का आदेश अंतिम आदेश नहीं हो सकता है। प्रशासन का यह रुख “नेम” और “सेम” का है। हम किसी अराजक राज्य में नहीं है कि सरकार ऐसा करे। होर्डिंग लगाकर सरकार लोगों की लॉन्चिंग करने के लिए उकसाना चाहती है।

वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्वेस ने कहा कि आप यह कैसे साबित करेंगे कि किसी व्यक्ति ने संपत्ति को नुकसान पहुंचाया है। इसके लिए कई तथ्यों की जरुरत होगी। इसका कोई वीडियो वाला सबूत नहीं है। गोंजाल्वेस ने कहा कि मैं मोहम्मद शोएब के लिए पेश हो रहा हूं। मैंने कई अल्पसंख्यकों के केस लिए हैं। मेरे मुवक्किल पर हमला हो सकता है। क्योंकि उनकी तस्वीर होर्डिंग पर लगी है।

वरिष्ठ वकील चंद्र उदय सिंह ने कहा कि वे निजता के अधिकार के उल्लंघन और ऐसे काम के लिए सरकार को मिले अधिकार पर बोलना चाहता हूं। होर्डिंग लगाने के अधिकार का स्रोत कानून होना चाहिए कोई दिशा-निर्देश या कार्यपालिका का आदेश नहीं। चंद्र उदय सिंह ने कहा कि आज के डेट में सरकार का रवैया प्रतिशोधी है और वो लोगों को टारगेट कर रही है। तब जस्टिस यूयू ललित ने कहा कि हम इस पर चर्चा नहीं कर रहे हैं।

यूपी सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। पिछले हफ्ते इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए 16 मार्च तक पोस्टर हटाने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने इसे निजता का उल्लंघन बताते हुए सभी होर्डिंग और पोस्टर हटाने का आदेश दिया था। इस पोस्टर पर 57 आरोपियों के नाम शामिल हैं। 19 दिसम्बर 2019 को लखनऊ में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ हिंसा हुई थी। इसके बाद यूपी पुलिस ने काफी लोगों को गिरफ्तार किया था। प्रशासन ने उनमें से 57 आरोपियों के खिलाफ सार्वजनिक संपत्ति के नुकसान की भरपाई के लिए वसूली का नोटिस जारी किया था। लखनऊ जिला प्रशासन ने पिछले हफ्ते शहर के प्रमुख चौराहों पर होर्डिंग लगवाया ता जिसमें इन आरोपियों की तस्वीरें, पता और निजी जानकारियां छापी गई थीं।

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