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म‌िलम ग्लेश‌ियर में हो रहा खतरनाक बदलाव, बढ़ सकता है खतरा

म‌िलम ग्लेश‌ियर में हो रहा खतरनाक बदलाव, बढ़ सकता है खतरा
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Captureट्रेक‌िंग पर गए युवाओं ने मिलम ग्लेशियर को लेकर एक बड़ा खुलासा क‌िया है। उन्होंने ग्लेश‌ियर को लेकर जो भी बात कही वह भव‌िष्‍य में बड़े खतरे को न्यौता देने वाली है।

यहां से ट्रैकिंग करके लौटे युवाओं के दल को बर्फ की रेखा देखने के लिए गांव से तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ा, जबकि पहले बर्फ की यह रेखा गांव से मात्र एक किमी की दूरी पर थी।

इसका मलतब यह ग्लेश‌ियर लगातार पीछे खिसक रहा है। गांव के लोगों ने युवाओं को बताया कि बर्फ की लाइन पिछले दस साल में तेजी से पीछे को खिसकी है।

हालांकि इस बारे में वैज्ञानिकों का कहना है कि जहां तक बर्फ की लाइन की बात है तो यह मौसम के ऊपर निर्भर करती है, जिस मौसम में बर्फबारी ज्यादा होती है तो यह लाइन गांव के पास दिखेगी।

तापमान बढ़ना भी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का एक कारण

वहीं ग्लेशियर अलग चीज है, इसके पिघलने की रफ्तार बढ़ी है, जिसकी ग्लोबल वार्मिंग के साथ कई वजह हैं। सात युवाओं के इस दल में चंडीगढ़ के छात्र करनजीत सिंह भी शामिल थे।

अन्य सदस्य पिथौरागढ़ जिले के थे। कॉसमॉस टूर एंड ट्रैवल्स की ओर से आयोजित इस ट्रैकिंग दल ने मिलम ग्लेशियर का व्यापक अध्ययन किया। स्थानीय लोगों से बात की। बताया कि मिलम ग्लेशियर दुनिया के अन्य ग्लेशियरों की तरह संकट में है।

इस बारे में जीबी पंत हिमालय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के वैज्ञानिक डॉ. किरीट कुमार ने फोन पर हुई बातचीत में बताया कि पिथौरागढ़ जिले में स्थित मिलम ग्लेशियर के पीछे खिसकने की दर 17-18 मीटर प्रति वर्ष है।

कुमाऊं में स्थित अन्य ग्लेशियर भी औसतन 10 से 15 मीटर पीछे खिसक रहे हैं। इन ग्लेशियरों के पीछे खिसकने के कुछ कारण प्राकृतिक तो कई मानवजनित हैं।

पृथ्वी का तापमान बढ़ना भी ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का एक कारण है। मानवजनित कारणों में प्रदूषण, ग्लेशियरों के निकट इंसानी गतिविधियों का बढ़ना है जिनपर रोकथाम से ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार को कम किया जा सकता है।

मिलम में मौसम सुहाना

टीम के सदस्य हर्षदेव बगौली, यशवंत खड़ायत, दिव्यदर्शन, हर्षवर्धन, तुषार, प्रांजल, मनोज ने बताया कि मिलम जाने के लिए 57 किमी का पैदल सफर तय करना पड़ा।

आठ दिन की ट्रैकिंग के बाद सोमवार को दल के सदस्य मुनस्यारी पहुंच गए। टीम के साथ गए मनोज कुमार ने बताया कि इस समय मिलम गांव में चहल-पहल है। सभी परिवार शीतकाल में छह महीने घाटियों में रहने के बाद लौट आए हैं। मिलम में इस समय मौसम बेहद खुशनुमा है। मिलम में लोग राजमा, राई, काला जीरा की खेती कर रहे हैं।

जड़ीबूटी उत्पादन के लिए यहां की जलवायु बेहतरीन है लेकिन यातायात की समस्या होने से उत्पादित माल को बाजार तक ले जा पाना संभव नहीं होता। अब मुनस्यारी से मिलम तक सड़क निर्माण का काम चल रहा है।

आने वाले वर्षों में यदि मिलम तक रोड पहुंच जाए तो ट्रैकिंग पर जाने वालों के साथ गांव के लोगों को भी आसानी हो जाएगी। इन लोगों ने बताया कि ट्रैकिंग के लिए बोगड्यार, लास्पा, मर्तोली में कैंप बनाए गए। वापसी में भी इन कैंपों में ही रुकना पड़ा।

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