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उत्तराखंड में रूझान से नहीं लगता सत्ता का अनुमान

उत्तराखंड में रूझान से नहीं लगता सत्ता का अनुमान
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bc-khanduri_1480000876विधानसभा चुनाव को लेकर आए ज्यादातर एक्जिट पोल बेशक उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बना रहे हैं, मगर राज्य का चुनावी इतिहास कभी इतना एक्जिट नहीं रहा है। राज्य में अब तक हुए तीन विधानसभा चुनाव के बारे में जो अनुमान लगाए गए थे, हर बार नतीजे उससे जुदा रहे। पुराने ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए राज्य के मतदाताओं की थाह लेना इतना भी आसान नहीं है।

वर्ष 2002 में प्रदेश का पहला विधानसभा चुनाव हुआ। ये भाजपा और कांग्रेस की नये राज्य में पहली चुनावी परीक्षा थी। भाजपा आत्मविश्वास से ज्यादा लबरेज थी। उसे यकीन था कि मतदाता से उसे नया राज्य बनाने का ईनाम देगी। तब भरोसा कांग्रेस का भी डोल रहा था।

मगर परिणाम खुला तो भाजपा चारों खाने चित थी और सत्ता की कमान कांग्रेस के हाथों में झूल रही थी। तब भाजपा 19 सीटों पर सिमटी और कांग्रेस 36 सीटों के साथ सत्ता पर काबिज हुई। बेहद अप्रत्याशित ढंग से कांग्रेस सरकार की बागडोर एनडी तिवारी सरीखे खांटी राजनेता के हाथों में सौंपी गई। केंद्रीय राजनीति में गहरी पैंठ के जरिये एनडी ने राज्य में विकास की शुरुआत की। कार्यकाल की समाप्ति तक एनडी कांग्रेसियों के लिए विकास पुरुष हो चुके थे।

उनकी छाया में कांग्रेस चुनाव में सत्ता में वापसी के इरादे से उतरी। इस बार वह भाजपा से ज्यादा आत्मविश्वास में दिखाई दी। मगर वर्ष 2007 में विधानसभा का जब नतीजा खुला तो कांग्रेस के हाथों से सत्ता फि सल कर भाजपा की मुट्ठी में कैद हो गई। 34 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी और कांग्रेस 21 सीटों पर सिमट गई।

पांच साल बाद एक बार फिर चुनाव आए। चुनावी हवाओं में ‘खंडूड़ी है जरूरी’ नारे में मगन भाजपा सत्ता में आने को लेकर एकदम आश्वस्त दिख रही थी। देश भर में लोकपाल और लोकायुक्त को लेकर चले अन्ना आंदोलन की रोशनी में चुनाव लड़ रही भाजपा को सत्ताअपने बेहद करीब नजर आ रही थी।

मगर जब नतीजे खुले तो भाजपा सत्ता से एक कदम दूर रह गई। उससे एक सीट ज्यादा (32) सीटों के साथ कांग्रेस ने गठबंधन बनाकर सत्ता पर कब्जा जमा लिया। इस तरह से लगातार तीसरी बार राज्य में चुनावी अनुमान धरे रह गए। सियासी हवाओं में सवाल तैर रहा है कि क्या इस बार चुनावी अनुमान सटीक बैठेंगे या एक बार फिर उम्मीद के विपरीत होंगे।

मोदी की हवा या हरीश का जलवा

भाजपा विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम नरेन्द्र मोदी की हवा के दम पर सत्ता में आने का ख्वाब देख रही है तो कांग्रेस को मुख्यमंत्री हरीश रावत के राजनीतिक जलवे पर भरोसा है। ऐसा पहली बार है कि दोनों ही दलों के शीर्ष नेताओं द्वारा 40 से 45 सीटें जीतने का दावा हो रहा है। जनता खामोश है और एक्जिट पोल के नतीजों ने फिलहाल कांग्रेसियों की हवाइयां उड़ाई हैं।

हम जीतेंगे और सरकार भी बनाएंगे। सर्वे तो केवल सर्वे ही हैं, ये नतीजे नहीं हैं। पूर्व में भी ऐसे सर्वेक्षण आ चुके हैं। पिछले चुनावों में भी ऐसे अनुमान गलत साबित हुए हैं। इस बार भी ऐसा ही होगा। हमारे कामों की वजह से जनता हमारे पक्ष में है।

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