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किसान की कलम से:बीजेपी को चुकानी पड़ी किसान को नाराज करने की कीमत

लेख/लखनऊ|
राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों को गौर से देखें तो मिजोरम को छोड़कर बाकी चार राज्यों में ‘किसान’ एक महत्वपूर्ण फैक्टर साबित हुआ है। बीजेपी को इसकी बड़ी कीमत इसलिए चुकानी पड़ गई कि वह किसानों की हकीकत से रूबरू नहीं हो सकी। बीजेपी को यही लगता रहा कि विपक्ष किसानों को राजनीति का मोहरा बना रहा है और किसान उतने नाराज नहीं हैं, जितने कि बताए जा रहे हैं। विपक्ष को कोई ‘भाव’ न देने की गर्ज से किसानों को भी कोई ‘भाव’ देने जरूरत नहीं समझी गई। मोदी सरकार को लगता रहा कि सरकारी खरीद मूल्य बढ़ाने के ऐलान भर से किसानों का समर्थन उसे हासिल हो जाएगा। उसने इस बात की तह में जाने की भी कोशिश नहीं कि उसकी घोषणाओं का लाभ किसानों तक पहुंच भी रहा है या नहीं।
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किसान को वाजिब दाम नहीं मिला

अब नतीजा सबके सामने है, लेकिन यह अंत नहीं, बल्कि एक तरह से शुरुआत है। यह शुरुआत बताती है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में किसान सबसे बड़ा फैक्टर बनने वाला है। इसकी वजह साफ है कि देश में ज्यादातर किसानों की आमदनी राष्ट्रीय औसत आय से भी कम है। फसल का वाजिब दाम न मिलने से वे कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं। पिछले साल के सरकारी आंकड़ों पर ही गौर करें तो पता चलता है कि अकेले राजस्थान में 85 लाख किसान परिवारों पर 82 हजार करोड़ रुपये का कर्ज था। हरियाणा में 15 लाख किसानों पर 56 हजार करोड़, महाराष्ट्र में 31 लाख किसानों पर 30 हजार करोड़ का कर्ज था। मध्य प्रदेश में किसानों पर कर्जे की रकम 74 हजार करोड़ की सीमा को पार कर रही थी। यूपी का आंकड़ा 86 हजार करोड़ का था। बढ़ते किसान कर्ज पर केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह का जवाब था कि सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही है।

कांग्रेस के साथ आए किसान

देखा जाए तो साल 2018 किसान आंदोलन का साल रहा। इस वक्फे में उन्हें आंदोलन बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ी। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि केंद्र से लेकर ज्यादातर राज्यों में सत्तारूढ़ बीजेपी ने इसे तवज्जो देने की जरूरत ही नहीं समझी। साल शुरू होते ही फरवरी में दिल्ली और हरियाणा में किसानों के प्रदर्शन और घेराव हुए। किसानों ने अपनी मांगों को लेकर महाराष्ट्र के नासिक से मुंबई तक पैदल मार्च भी किया। इसके बाद 3 बार अलग-अलग राज्यों के किसान दिल्ली कूच कर चुके हैं, लेकिन किसानों की इस नाराजगी को विपक्ष प्रायोजित आंदोलन समझने की चूक से किसानों का गुस्सा बीजेपी को लेकर बढ़ता ही गया। 5 राज्यों के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इस गुस्से को भुनाने की कोशिश की और इसमें उसे बहुत हद तक कामयाबी भी मिली। कांग्रेस ने सबसे बड़ा कार्ड यह खेला था कि किसानों के गुस्से से धधक रहे इन राज्यों में अपनी सरकार बनने पर उसने कर्ज माफी का वादा कर दिया था।
इस वादे का असर मतदान से पहले ही दिखाई पड़ने लगा था, जब किसानों ने वादे पर यकीन करते हुए सरकारी कर्ज की अदायगी से अपने हाथ रोक लिए। किसानों को यह लगने लगा था कि कांग्रेस के सत्ता में आते ही कर्ज माफी का ऐलान तो हो ही जाएगा, ऐसे में वह अपनी जेब से कर्ज की अदायगी क्यों करें? छत्तीसगढ़ में तो किसानों ने सरकारी क्रय केंद्रों पर अपनी फसल बेचने के लिए ले जाना ही बंद कर दिया था क्योंकि फसल बेचने से मिलने वाली रकम से वे कर्ज की कटौती नहीं चाहते थे। कर्ज माफी के जरिए सत्ता वापसी का नुस्खा कांग्रेस ने पहले भी आजमाया हुआ है। 2008 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले यूपीए सरकार ने किसानों के 70 हजार करोड़ रुपये के कर्ज माफ कर दिए थे। करीब साढ़े तीन करोड़ किसानों को इससे फायदा हुआ था। नतीजतन कांग्रेस की 2009 में सत्ता में वापसी हो गई थी।

जोर सिर्फ लुभाने-कमाने पर

2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने किसानों से वादा किया था कि अगर उनकी सरकार बनी तो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू किया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसमें कोई शक नहीं कि 2019 के चुनाव में किसान और कर्ज माफी बड़ा मुद्दा होगा। कांग्रेस ने राज्यों में कर्ज माफी के वादे के जरिए जिस तरह वापसी की है, उसे वह लोकसभा के चुनाव में यकीनी तौर पर दोहराना चाहेगी। पार्टी के नेताओं ने बातचीत में यह स्वीकार भी किया कि वे राज्यवार टुकड़ों में किसानों के कर्ज माफ करने के बजाय पूरे देश मे एकमुश्त किसान कर्ज माफी की योजना पर विचार कर रहे हैं और 2019 के लिए बनने वाले घोषणापत्र में इसका ऐलान भी होगा।
उधर इन नतीजों से बीजेपी ने भी जरूर सबक लिया होगा। कहा जा रहा है कि बीजेपी कैंप में भी कांग्रेस की कर्ज माफी के ऐलान को पांच राज्यों के चुनाव में निर्णायक माना जा रहा है। 2019 का चुनाव बीजेपी के लिए बेहद अहम होगा और वह किसी भी कीमत पर सत्ता में वापसी करना चाहेगी। ऐसे में किसानों की कर्ज माफी को लेकर अगर उसकी तरफ से भी कोई बड़ा ऐलान हो जाता है तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। कम से कम चुनाव के मौके पर कोई भी पार्टी किसानों की अनदेखी का जोखिम नहीं लेना चाहेगी। वैसे अगर राजनीतिक दल कर्ज माफी का तत्कालिक लाभ दिखा कर वोट लेने के बजाय किसानों की आय बढ़ाने के लिए स्थायी पहल करते तो वह बेहतर हो|
लेख आभार युवा किसान हरीश वर्मा.
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