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भारत के बिहार का वह रोहतास जिला जिसे आपने नहीं घुमा तो क्या घुमा ?

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रोहतास जिले के कैमूर पहाड़ी पर स्थित मांझर कुंड और धुआं कुंड अपनी मनोरम सुंदरता के लिए जाना जाता है। बरसात की शुरुआत होते ही यहां पर्यटकों की आमद बढ़ जाती है। मांझर कुंड और धुआं कुंड जलप्रपात दशकों से प्रकृति प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। यहां आकर लोग प्रकृति के संगीत को करीब से सुन पाते हैं। पहाड़ से गिरते पानी को निहारना रोमांचक एहसास देता है।

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कैमूर पर्वत श्रृंखला में तीन किमी की परिधि में अवस्थित मांझर कुंड व धुंआ कुंड राज्य के रमणीक स्थानों में महत्व रखते हैं। पर्वत पर काव नदी का पानी एक धारा बना कर टेढ़े मेढे रास्तों से गुजरते हुए मांझर कुंड के जलप्रपात में इकट्ठा होता है। उपर से बहने वाला पानी जाकर ऊँचे पर्वत से झरना के रूप में जमीन पर गिरता है। ये प्राकृतिक छटा अांखों को सुकून पहुंचाती है।

मांझर कुंड

वहीं मांझर कुंड की कुछ दूरी पर 36.5 मीटर की उंचाई से 6 मील की गहरी घाटी में गिरने वाले पानी से उठते धुंध को लेकर उस स्थान को धुंआ कुंड का नाम मिल गया है। पहाड़ी से गहरी घाटी में गिर रहे इस जलप्रपात का लुत्फ उठाने रोहतास ही नहीं बगल के कैमूर, भोजपुर, औरंगाबाद और पटना के अलावे देश के अन्य राज्यों से भी सैलानी पहुंचते है।

 

मांझर कुंड का धार्मिक महत्व भी है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक सिखों के एक गुरु ने इसी दिन अपने अनुयाइयों के साथ उक्त मनोरम स्थल पर अपनी रात बिताई थी। तभी से यह स्थल सिख समुदाय के लिए तीन दिनों तक तीर्थ माना जाने लगा। पूर्व में रक्षाबंधन के बाद पड़ने वाले पहले रविवार को यहां गुरुग्रंथ साहब को ले जाने की परंपरा रही थी।

मांझर कुंड

सिख समुदाय के लोग सपरिवार तीन दिनों तक मांझर कुंड पर प्रवास करते थे। इनके अलावा बिहार के अलावा देश के अन्य राज्यों से भी हजारों सैलानी पहुंचते और पिकनिक मनाते थे। कोई खाने-पीने का रेडिमेड सामान लेकर पहुंचता था, वहीं काफी संख्या में लोग जल प्रपात के आसपास पहाड़ी पर ही फैल अपने मन पसंद का भोजन बना लजीज व्यंजनों का लुत्फ उठाते थे। कुंड का पानी औषधीय होने के कारण भोजन पचाने में काफी सहायक सिद्ध होता है। लेकिन धीरे-धीरे यह मौका धार्मिक बन्धनों को तोड़कर आम लोगों के लिए पिकनिक स्थल बन गया।

मांझर कुंड वाटरफॉल

मालूम हो कि, अस्सी के दशक में कैमूर पहाड़ी पर दस्युओं द्वारा ठिकाना बना लेने व बाद में नक्सलियों के प्रभाव के कारण पिकनिक मनाने वालों की आवाजाही काफी कम हो गई थी। लेकिन कैमूर पहाड़ी से नक्सलियों का खात्मा होने के बाद अब हर वर्ष मांझर कुंड जलप्रपात पिकनिक मनाने वालों से गुलजार हो उठता है।

मांझर कुंड से धुआं कुंड जाने का रास्ता

मांझर कुंड जलप्रपात की प्राकृतिक छटा के पास युवाओं में पिकनिक को ले भी खासा उत्साह रहता है। रोहतास जिले के अलावा अन्य जगहों से लोग हाथ में बर्तन, गैस चूल्हा व अन्य सामान के साथ बाइक व चारपहिया वाहन से मांझर कुंड जलप्रपात के पास पिकनिक मनाने पहुंचते है।

मांझर कुंड के पास बने इस बंकरनुमा घर से प्राकृतिक की छटा देखते ही बनती है.

हर साल सावन पूर्णिमा के बाद पड़ने वाले पहले रविवार को 50 हजार से ज्यादा संख्या में सैलानी यहां पहुंचते है। जहां पिकनिक के रूप में मुर्गा, भात और पकवान का मजा लेते है। उक्त स्थल के पानी की खासियत है कि ओवर डोज खाना खाने के बावजूद उक्त झरने का पानी पीने पर घंटे, दो घंटे में फिर से खाना खाने की जरुरत महसूस होने लगती है।

धुआं कुंड की घाटी

राजधानी पटना से करीब 158 किलोमीटर और सासाराम शहर से 10 किलोमीटर दूर मांझर और धुआं कुंड जलप्रपात तक जाने के लिए ताराचंडी मंदिर के पास से सड़क बनी हुई हैं लेकिन पहाड़ी पर कुछ दूरी जाने के बाद सड़क की स्थिति थोड़ी दयनीय है। बाइक व चारपहिया वाहन यहां सुबह जाकर शाम तक लौट सकते हैं।

पहाड़ी के ऊपर मांझर कुंड जाने का रास्ता

साथ ही हमारी टीम आपसे अनुरोध करती है कि किसी भी जलप्रपातों पर घुमने जाने से पहले इन बातों का जरुर ध्यान रखें:- सेल्फी लेने के लिए जलप्रपात के खतरनाक जगहों पर न जाएं, बारिश के कारण फिसलन का डर है। ऐसे जगहों पर खाली पैर ही ट्रेकिंग करें। तेज उफान वाले जगहों के ज्यादा करीब आने का प्रयास न करें, इन जगहों पर खतरों की अंदेशा बनी रहती है। साथ ही जिले के बाहर के सैलानी जलप्रपात के पास जाने के लिए स्थानीय लोगों की मदद जरुर लें।

मांझर कुंड
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