विरासत को समझने-सहेजने की दरकार

शून्य का अस्तित्व शून्य ही नहीं होता। यह दाएं बैठकर अंकों की शक्ति 10 गुना बढ़ाता है और बाएं बैठकर अस्तित्वहीन। शून्य का मर्म सबसे पहले भारत में ही जाना गया था। पं. जवाहरलाल नेहरू ने ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ में गणितज्ञ डानजिंग की किताब ‘नंबर’ का हवाला दिया है। डानजिंग ने लिखा था ‘अनजाने हिंदू के स्थान मूल्य सिद्धांत की खोज लोकव्यापी महत्व की है।

आश्चर्य है कि यूनानी गणितज्ञों ने इसकी खोज क्यों नहीं की।’‘मैथमेटिक्स द मिलियन’ में हागबेन ने सटीक उत्तर दिया है ‘हिंदुओं ने ही कदम क्यों बढ़ाया? यह कठिनाई हल नहीं कर सकते अगर हम बौद्धिक विकास को कुछ प्रतिभाशाली लोगों के प्रयासों का ही परिणाम मानेंगे। हमें उस पूरी सामाजिक परंपरा और विचार का परिणाम समझना चाहिए। 100वीं ई. के आसपास भारत में जो हुआ है, वह पहले भी हो चुका है।’ पाकिस्तान में पेशावर के निकट बख्शाली गांव से प्राप्त बख्शाली लिपि में शून्य की जानकारी खासी चर्चा में है। 1881 में प्राप्त यह जानकारी ऑक्सफोर्ड पुस्तकालय में है। संस्कृत अनुवाद के अनुसार यह व्यापारियों का व्यावहारिक गणित था। कार्बन डेटिंग में यह खोज उपलब्ध जानकारियों से भी 500 वर्ष पुरानी है। 4 अक्टूबर को लंदन के साइंस म्यूजियम में ‘इल्यूमिनेटिंग इंडिया, विज्ञान और शोध के 5000 वर्ष’ प्रदर्शनी में इसका प्रदर्शन होगा। संस्कृति, इतिहास और दर्शन भौगोलिक सीमा में नहीं बंधते।

बख्शाली भारतीय ज्ञान परंपरा की विरासत है। यह क्षेत्र पाकिस्तानी हिस्सा है। भारत को इस पर गर्व है। पाकिस्तान को भी इस पर गर्व करना चाहिए, लेकिन पाकिस्तानी शासक प्राचीन इतिहास को नष्ट कर रहे हैं। दुर्भाग्य से भारतीय संस्कृति दर्शन और वैज्ञानिक शोध वाले तमाम प्रतिष्ठित क्षेत्र अब पाकिस्तान में हैं। दुनिया का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय तक्षशिला भारतीय स्वाभिमान का प्रतीक था। दुनिया के पहले व्याकरणकर्ता अष्टाध्यायी के लेखक पाणिनि का क्षेत्र भी अब पाकिस्तान में है। कात्यायन ने यहीं ‘वार्तिक’ रचा। पतंजलि ने इसी जगह अष्टाध्यायी पर ‘महाभाष्य’ लिखा था। आयुर्वेद महाविज्ञानी चरक की ‘चरक संहिता’ का सृजन भी इसी भूभाग में ही हुआ था। दर्शन और वैज्ञानिक खोजें विद्वानों की व्यक्तिगत उपलब्धि ही नहीं हैं। यह भारतीय संस्कृति आधारित सामूहिक मानव चेतना का प्रतिफल है। यूरोपीय देशों में ऐसा नहीं हो पाया तो इसके कारण सुस्पष्ट हैं। प्राचीन यूरोपीय समाजों में दर्शन और विज्ञान की सामूहिक चेतना का अभाव रहा है। 

वैदिक संस्कृति और दर्शन के विकास का भूक्षेत्र भी ध्यान देने योग्य है। सिंधु नदी पहले भारत के मन को सहलाती-नहलाती थी, लेकिन अब वह पाकिस्तानी है। ऋग्वेद के कवियों की सिंधु प्रीति चर्चित है। वे नदियों को ‘सप्तसिंधु’ कहते हैं-‘इंद्र ने सप्तसिंधुषु में जल प्रवाहित किया।’ मैक्डनल और कीथ ने लिखा है ‘यहां एक सुनिश्चित देश का नाम लिया गया है। पुसाल्कर ने नदी नामों के आधार पर इस देश का खाका बनाया है। इसमें अफगानिस्तान, पंजाब, सिंध, राजस्थान, पश्चिमोत्तर सीमांत कश्मीर व सरयू तक का पूर्वी भारत है। माक्र्सवादी चिंतक डॉ. रामविलास शर्मा ने लिखा है, ‘जिस देश में ऋग्वेद की सात नदियां बहती हैं, यह लगभग वही देश है जिसमें जल प्रलय के बाद हड़प्पा सभ्यता का विकास हुआ। हड़प्पा नगरों की राष्ट्रीय एकता वास्तुकला, मुद्राओं आदि की समानता से जानी जाती है। इस राष्ट्रीय एकता की नींव ऋग्वेद ने डाली थी।’ सप्तसिंधु के नाम वाली इस भूक्षेत्र की नदियां अब पाकिस्तानी हैं? पाकिस्तान नदी तट पर उगे दर्शन और वैज्ञानिक विवेक को नहीं अपनाता, लेकिन भारत में इन नदियों का नाद सतत् प्रवाही है। 

भूक्षेत्रों का स्वामित्व परिवर्तनीय है, लेकिन पूर्वजों द्वारा स्थापित जीवन मूल्यों का नहीं। ऋग्वेद के नदी सूक्त में कहते हैं ‘जैसे माताएं शिशु की ओर जाती हैं और गाएं बछड़े की ओर, उसी तरह सारी नदियां समुद्र की ओर जाती हैं।’ यह वैज्ञानिक विवेक हुआ। इसी सूक्त में भूगोल की ओर ध्यान दें। कहते हैं ‘हे सिंधु आप तुष्टामा के साथ बही। फिर सुसर्तु, रसा और श्वेत्या से मिली। आप क्रमु, गोमती, कुभा और मेहत्नु को भी अपने साथ मिलाती हैं।’ फिर कहते हैं ‘हे गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतद्री, परूष्णी, अस्किनी, मरूद्वृधा, वितस्ता, सुषोमा और आर्जकीय नदियों आप हमारी प्रार्थना सुनो।’ यह हुआ सांस्कृतिक भावबोध। ऋग्वेद में विश्वामित्र ने व्यास व सतलुज नदियों से वार्ता की। बेशक यहां भाव प्रवणता है, लेकिन नदी पार करना इतिहास है। ईरान, अफगान तक वैदिक संस्कृति का प्रवाह ऐतिहासिक तथ्य है।

अफगानिस्तान,पाकिस्तान और बांग्लादेश सहित भारत एक सांस्कृतिक इकाई है। इस संस्कृति का प्रभाव ईरान तक है। हम सब कुछ बदल सकते हैं, लेकिन पूर्वज नहीं। हम उन्हें छोड़कर इतिहास बोध से कट जाते हैं और इतिहास बोध से कटे समाज जड़ों से टूटे पेड़ जैसे सूख जाते हैं। हड़प्पा सभ्यता को वैदिक काल से प्राचीन मानने वाले कम नहीं हैं। सच यह है कि हड़प्पा सभ्यता ऋग्वैदिक संस्कृति का ही विकास है। इस सभ्यता पर गर्व किया जाता है, लेकिन हड़प्पा का क्षेत्र भी अब भारत का भूभाग नहीं है। यह पाकिस्तानी सिंध क्षेत्र का भाग है। ऋग्वेद का रचना क्षेत्र या मंत्रों के अवतरण का अधिकांश क्षेत्र सप्त सिंधु का क्षेत्र है। ऋग्वेद भारतीय दर्शन और वैज्ञानिक विवेक का आदि स्नोत है। दर्शन और विज्ञान में भूक्षेत्र की सीमा नहीं होती। संपूर्ण वैदिक साहित्य का सृजन प्राचीन भारत में हुआ था। धरती को माता और आकाश को पिता जानने वाले पूर्वजों ने ही ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का उद्घोष किया। क्या भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के आधार पर हम प्राचीन सांस्कृतिक विरासत का वास्तविक मूल्यांकन कर सकते हैं? भारत केवल भूक्षेत्र नहीं है। राष्ट्र राज्य तमाम कारणों से टूटा करते हैं। वैज्ञानिक विवेक, संस्कृति और दर्शन सामूहिक विरासत हैं। पाकिस्तान भी इसे स्वीकार कर ले तो प्राक् भारतीय ज्ञान की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।

 
साहित्य, संगीत और कला भारतीय संस्कृति के मुख्य अंग हैं। यहां गांधार, मथुरा व सारनाथ भारत के तीन प्रमुख कला संप्रदाय रहे हैं। इनमें गांधार क्षेत्र अब भारतीय भूभाग नहीं है। इसकेसृजन में यूनानी कला और भारतीय दर्शन का मेल रहा है। प्राक् भारतीय संस्कृति और सभ्यता के तमाम केंद्र व क्षेत्र अब पाकिस्तान में हैं। भारत विभाजन के बाद पाकिस्तान में प्राचीन परंपरा से मुक्ति का अभियान चला। ब्रिटिश पुरातत्ववेत्ता मार्टिमर व्हीलर ने पाकिस्तान को इतिहास सामग्री देने की कोशिश की। 1949 में ‘पाकिस्तान क्वार्टरली’ में ‘पाकिस्तान 4 हजार वर्ष पहले’ शीर्षक से उनका लेख छपा था। 1950 में उन्होंने ‘पाकिस्तान के पांच हजार साल एक पुरातात्विक रूपरेखा’ नामक पुस्तक लिखी। व्हीलर की मंशा पाक को भारतीय विरासत से मुक्त करने की थी जो मजहबीे आधार पर संस्कृति संपन्न नहीं हो सकता। सांस्कृतिक संपन्नता के लिए उसे प्राचीन भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति स्वाभिमानपूर्ण योजकता बढ़ानी होंगी। भारतीयों को भी संस्कृति के प्रति गौरवबोध करना होगा। यह संस्कृति विश्व प्रेरणा है। इसलिए यूनेस्को सहित सभी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी आगे आना होगा। 

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