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देश में महागठबंधन की टूटने की लगीं सांसें, यूपी से लेकर आंध्र तक बुरा हाल

मोदी सरकार को दोबारा सत्ता में आए हुए केवल 12 दिन हुए हैं…और इतने कम समय में ही मोदी विरोध की महामिलावट वाली राजनीति की सांसें टूटने लगी हैं. उत्तर प्रदेश में मायावती और अखिलेश यादव का गठबंधन टूट गया है. राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और डिप्टी CM सचिन पायलट के बीच हार की ज़िम्मेदारी को लेकर तकरार हो रही है. पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के बीच रिश्ते बिगड़े हुए हैं. कर्नाटक में कांग्रेस और JDS के गठबंधन पर भी ख़तरा मंडरा रहा है. मध्य प्रदेश कांग्रेस में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया…इन दो ख़ेमों में भी मतभेद बढ़ रहे हैं.

आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की TDP और कांग्रेस के रिश्ते भी बुरे दौर में पहुंच चुके हैं. विपक्ष के बिखराव की आज बड़ी शुरुआत उत्तर प्रदेश से हुई है. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन आज टूट गया है. दोनों दलों ने उत्तर प्रदेश में 11 सीटों पर होने वाले विधानसभा उप-चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा की है. मायावती को ये शिकायत है कि BSP का वोट तो समाजवादी पार्टी को मिला, लेकिन अखिलेश यादव अपनी पार्टी का वोट BSP में ट्रांसफर करने में नाकाम रहे. लेकिन मायावती की शिकायत कितनी जायज़ है…या गठबंधन तोड़ने के पीछे ये बस एक बहाना है…इसका आंकलन दोनों पार्टियों को मिले वोट से किया जा सकता है.

पिछले लोकसभा चुनाव के मुक़ाबले BSP का वोट प्रतिशत तो बरक़रार रहा…लेकिन समाजवादी पार्टी को क़रीब साढ़े चार प्रतिशत वोट का नुक़सान हुआ है. BSP को इस बार 19.2 प्रतिशत वोट मिले हैं जबकि…2014 में उसे 19.7 प्रतिशत वोट मिले थे. वहीं समाजवादी पार्टी को इस बार 17.9 प्रतिशत वोट मिले हैं…जबकि पिछली बार उसे 22.3 प्रतिशत वोट मिले थे.

ये रिश्ता वोट बैंक के आधार पर तय हुआ था. दोनों पार्टियों को उम्मीद थी कि गठबंधन होने से यादव वोट, मुस्लिम और अनुसूचित जाति के वोट…सब उनके खाते में आ जाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उनकी बाज़ी उलटी पड़ गई. अखिलेश यादव और मायावती ने एक साथ क़रीब 19 बड़ी रैलियां कीं. मैनपुरी में मुलायम सिंह यादव के लिये मायावती भी प्रचार करने पहुंची थीं. लेकिन दोनों दल ये भूल गए कि जनता की याददाश्त बहुत अच्छी है. वोट बैंक की राजनीति के लिए मायावती 2 जून 1995 को हुए लखनऊ गेस्ट हाउस कांड को भी भूल गईं. लेकिन, ये वो घटना थी, जिसे लेकर उन्होंने समाजवादी पार्टी पर अपनी हत्या की साज़िश रचने का आरोप लगाया था.

लोकसभा चुनाव के नतीजों ने मायावती को एहसास दिला दिया कि जनता मूर्ख नहीं है. अखिलेश यादव और मायावती ने मिलकर उत्तर प्रदेश में 70 सीट जीतने वाले बहुत बड़े-बड़े सपने देखे थे. लेकिन सपना टूटा तो उनका गठबंधन भी चूर-चूर हो गया है. इसकी भविष्यवाणी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नतीजे आने से पहले ही कर दी थी.

उत्तर प्रदेश में इस बार बीजेपी का वोट 7 प्रतिशत बढ़ा है. वर्ष 2014 में बीजेपी को 42.6 प्रतिशत वोट मिले थे. इस बार बीजेपी को 49.6 प्रतिशत वोट मिले हैं. बीजेपी गठबंधन ने इस बार 64 सीट जीती हैं. चुनाव नतीजों के बाद से ही उत्तर प्रदेश का ये गठबंधन वेंटिलेटर पर था…आज इसकी मृत्यु का एक तरह से बस औपचारिक ऐलान किया गया है.

चुनाव के दौरान कहा जा रहा था कि समाजवादी पार्टी और BSP, दोनों मिलकर बीजेपी को उत्तर प्रदेश में इतना बड़ा नुक़सान पहुंचाएंगे कि बीजेपी के लिये बहुमत लाना मुश्किल हो जाएगा. लेकिन लोगों को मुलायम सिंह यादव और मायावती के कड़वे राजनीतिक संबंध अच्छी तरह याद रहे.

उत्तर प्रदेश में इस बार समाजवादी पार्टी ने 37 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन, वो केवल 5 सीट जीत सकी। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी को इतनी ही सीट मिली थीं. BSP ने 38 सीट पर चुनाव लड़ा था…और उसे 10 सीट पर जीत मिली। ये 10 सीट भी उसके लिये बोनस की तरह हैं क्योंकि पिछले लोकसभा चुनाव में उसका खाता भी नहीं खुला था.

समाजवादी पार्टी की हालत BSP के मुक़ाबले इसलिये ज़्यादा ख़राब हुई है, क्योंकि पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव अपनी सीट कन्नौज से चुनाव हार गईं. अखिलेश यादव के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव बदायूं से हार गए. BSP ने इस बार जौनपुर, ग़ाज़ीपुर, घोसी, लालगंज, अंबेडकरनगर और श्रावस्ती जैसी ज़्यादा यादव वोट वाली सीट जीती हैं. जबकि समाजवादी पार्टी हाथरस, हरदोई, कौशांबी, फूलपुर, बाराबंकी, बहराइच और RobertsGanj (रॉबर्ट्सगंज) जैसी ज़्यादा दलित वोट वाली सीट हार गई.

कहा जा रहा है कि कन्नौज में अखिलेश की पत्नी डिंपल यादव की हार के पीछे बड़ी वजह अनुसूचित जाति का वोट है…जो बीजेपी की तरफ़ शिफ्ट हो गया. यानी मायावती के पैर छूने से भी डिंपल को वोट वाला आशीर्वाद नहीं मिला. उत्तर प्रदेश में हुआ ये गठबंधन वोट बैंक के वो Post Dated चेक थे जो मायावती और अखिलेश यादव ने एक दूसरे को दे तो दिये थे..लेकिन नतीजे आने पर ये चेक बाउंस हो गए, क्योंकि उनके खाते में वोट कम थे. हालांकि 12 जनवरी 2019 को दोनों नेताओं ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके गठबंधन को लेकर बड़ी-बड़ी बातें की थीं.

बहुत सारे लोगों का तो ये मानना है कि मायावती ने आज मुलायम सिंह यादव से अपना 1995 का बदला ले लिया. देखा जाये तो इस गठबंधन में बड़ी क़ुर्बानी अखिलेश यादव ने दी है. इस पूरे गठबंधन में हर मौक़े पर मायावती Boss की तरह नज़र आईं, समाजवादी पार्टी पर मायावती की ही मर्ज़ी हावी रही.

उन्होंने अखिलेश यादव के साथ तो चुनावी रैली की..लेकिन समाजवादी पार्टी के किसी भी प्रत्याशी के लिये अलग से प्रचार नहीं किया. जबकि अखिलेश यादव ने BSP के 30 से ज़्यादा उम्मीदवारों के लिये अकेले रैलियां कीं. दोनों के गठबंधन में राष्ट्रीय लोकदल भी शामिल था…लेकिन मायावती ने अपने कोटे से उसकी तीसरी सीट की मांग पूरी नहीं की. अखिलेश यादव ने ही अपने कोटे से मथुरा सीट RLD को दी. पिछली बार एक भी सीट नहीं जीतने वाली BSP इस लोकसभा चुनाव में 10 सीटों के साथ फिर से ज़िंदा हो गई है. सीट चुनने की प्रक्रिया में भी अखिलेश यादव, मायावती के दबाव में नज़र आए. मायावती ने समाजवादी पार्टी के लिये 10 ऐसे शहरों की सीट छोड़ीं…जहां बीजेपी हावी रही है.

इनमें वाराणसी, लखनऊ, ग़ाज़ियाबाद, कानपुर, झांसी, गोरखपुर, अयोध्या, इलाहाबाद, बरेली, उन्नाव जैसे लोकसभा क्षेत्र थे. इसलिये अखिलेश यादव सिर्फ़ 27 जगह ही मज़बूती से लड़ पाये. देखा जाये तो इस गठबंधन में मायावती सीनियर और अखिलेश जूनियर पार्टनर की भूमिका में नज़र आये. पहले चुनाव के नतीजे और अब गठबंधन का बिखराव…इन दोनों बातों को अब मायावती के बदले के रूप में देखा जा रहा है…जो उन्होंने समाजवादी पार्टी से लिया है.

विपक्ष की इस बड़ी हार का असर आपको दूसरे राज्यों में भी देखने को मिलेगा. कई राज्यों में तो इस तरह के हालात पैदा भी हो गये हैं. राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जोधपुर से अपने बेटे की हार के लिये डिप्टी CM सचिन पायलट को ज़िम्मेदार बता रहे हैं. पंजाब में कांग्रेस 13 में से 8 सीट जीती है…इसके बावजूद कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं. चुनाव नतीजों के बाद अमरिंदर सिंह कह चुके हैं कि सिद्धू अपने मंत्रालय का काम ही नहीं संभाल पा रहे हैं. कर्नाटक में 28 में से 25 सीट हारने वाला कांग्रेस और JDS का गठबंधन भी सदमे से उबर नहीं पा रहा है. इस हार के लिये दोनों पार्टी एक दूसरे को ज़िम्मेदार ठहरा रही हैं.

मध्य प्रदेश में भी सत्ता के 3 ध्रुव कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के गुटों में शीत युद्ध चल रहा है. राहुल गांधी ने तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में यहां तक कह दिया कि कांग्रेस के नेता अपने बेटों को जिताने के चक्कर में पार्टी को हरा बैठे. फिर भी, मुख्यमंत्री कमलनाथ ना CWC की बैठक में दिल्ली आये, ना ही कोई सफ़ाई पेश की. बिहार में हार के बाद महागठबंधन में फूट पड़ चुकी है. 40 में से सिर्फ़ एक सीट जीत पाये गठबंधन की जब बैठक हुई…तो उसमें कांग्रेस के नेता नहीं पहुंचे.  ये तो उन राज्यों का हाल था जहां कांग्रेस बुरी तरह हारी है…लेकिन केरल में कांग्रेस गठबंधन ने 20 में से 19 सीट जीती थीं. इसके बाद भी कांग्रेस के विधायक A.P.अब्दुल्ला कुट्टी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं की तारीफ़ करने पर बर्ख़ास्त कर दिया गया.

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